उत्तराखंड में भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े तीन प्रसिद्ध मंदिर- बंसी नारायण, सेम मुखेम नागराज और मुरली मनोहर मंदिर, जानिए इनके रहस्‍य

उत्‍तराखंड। बर्फ से ढकी चोटियां, हरे-भरे बुग्याल और पवित्र नदियों के उदगम स्‍त्रोतों की जन्‍मस्‍थली उत्‍तराखंड यूं तो प्रकृति का स्‍वर्ग कहलाता है। लेकिन, इस पावन भूमि पर देवी-देवताओं ने कई अवतार लिए। ऋषियों-मुनियों ने युगों-युगों तक तपस्या की। जिनके कारण इस पहाड़ी प्रदेश को ‘देवभूमि’ के नाम से भी जाना जाता है। यहां के पौराणिक स्‍थल और मंदिर इसकी गवाही देते हैं। भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े यहां कई प्रसिद्ध मंदिर और विशेष धार्मिक स्थल हैं। लेकिन, टिहरी गढ़वाल का सेम मुखेम नागराज मंदिर। चमोली का बंसी नारायण मंदिर, यह मंदिर साल में मात्र एक दिन खोला जाता है। और अल्‍मोड़ा का मुरली मनोहर मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

1- प्रदेश के टिहरी गढ़वाल जिले में स्थित सेम मुखेम नागराज मंदिर से जुड़ा मुख्य रहस्य भगवान श्रीकृष्ण और नागराज के स्वरूप से जुड़ा है। इसे उत्तराखंड का ‘पाँचवाँ धाम’ भी कहा जाता है। मंदिर के गर्भगृह में नागराज की स्वयंभू शिला है। इस शिला पर श्रीकृष्ण फन के ऊपर बांसुरी बजाते हुए नजर आते हैं।
मान्यता है कि द्वापर युग के अंत में जब द्वारका नगरी जल में डूब गई थी, तब भगवान श्रीकृष्ण ने हिमालय की शांत वादियों की ओर रुख किया और इसी स्थान को अपना निवास और विश्राम स्थल बनाया। कथाओं में यह भी कहा जाता है कि, श्रीकृष्ण यहाँ कालिया नाग का उद्धार करने पहुंचे थे। उस समय यहाँ ‘गंगू रमोला’ नामक स्थानीय राजा का आधिपत्य था। आज भी मंदिर में नागराज की पूजा से पहले गंगू रमोला के परिवार की पूजा की जाती है। स्‍थानीय लोगों का मानना है कि मंदिर के पास के पानी से स्नान करने और नाग-नागिन का जोड़ा चढ़ाने से कालसर्प दोष और चर्म रोग ठीक होने की मान्यता है। यह पवित्र स्थल समुद्र तल से लगभग 7,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है, जहाँ लगभग 2.5 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई करके पहुँचा जाता है।

देश का एक ऐसा मंदिर जो साल में 364 दिन रहता है बंद, रक्षाबंधन पर एक दिन के लिए खुलते हैं कपाट

2- चमोली जिले की उर्गम घाटी में मौजूद बंसी नारायण मंदिर, केवल रक्षाबंधन के दिन ही खोला जाता है। बाकि पूरे साल 364 दिन इसके कपाट बंद रहते हैं। मंदिर में भगवान नारायण और भगवान शिव की मूर्तियां स्थापित हैं।
समुद्र तल से लगभग 12,000 फीट (3,600 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित यह मंदिर कत्यूरी वास्तुकला और रोचक पौराणिक कथाओं का एक अनूठा संगम है। मंदिर निर्माण का समय 8वीं शताब्दी ईसवी के आसपास का है। जोशीमठ, हेलंग से 15 किलोमीटर दूर इस मंदिर के आसपास की महिलाएं और लड़कियां भाईयों को राखी बांधने से पहले यहां पूजा करती हैं। यहां भगवान श्रीकृष्ण और शिवजी की प्रतिमा स्थापित हैं।
स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, जब पांडव स्वर्गारोहण के लिए जा रहे थे, तब उन्होंने इस भव्य मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की एक सुंदर चतुर्भुज पाषाण प्रतिमा विराजमान है। अनोखी बात यह है कि इस प्रतिमा में भगवान नारायण के साथ-साथ भगवान शिव के स्वरूप के भी दर्शन होते हैं। मंदिर परिसर में भगवान गणेश और वन देवियों की मूर्तियां भी स्थापित हैं।
राजा बलि और माता लक्ष्मी से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि का घमंड तोड़ा और उनसे तीन पग भूमि दान में मांग ली तो बलि ने अपना सर्वस्व दान कर दिया। राजा बलि की इस दानवीरता और भक्ति से प्रसन्न होकर नारायण ने उनसे वरदान मांगने को कहा। राजा बलि ने भगवान से अपने साथ पाताल लोक चलकर वहाँ का द्वारपाल बनने का वरदान मांग लिया और विष्णु जी पाताल चले गए। पति के पाताल लोक जाने से माता लक्ष्मी व्याकुल हो गईं। तब देवर्षि नारद ने उन्हें उपाय बताया कि वे श्रावण पूर्णिमा के दिन पाताल लोक जाकर राजा बलि को रक्षासूत्र (राखी) बांधें और उपहार स्वरूप अपने पति को मांग लें। माता लक्ष्मी ने ऐसा ही किया और राजा बलि ने भगवान विष्णु को मुक्त कर दिया। पाताल लोक के बंधन से मुक्त होने के बाद भगवान विष्णु सबसे पहले इसी स्थान (उर्गम घाटी) पर प्रकट हुए थे, जिसके बाद यहाँ बंसी नारायण रूप में उनकी स्थापना हुई।
दूसरी मान्यता है कि जब माता लक्ष्मी और नारद मुनि भगवान विष्णु को लेने पाताल लोक गए थे, तब उस श्रावण पूर्णिमा के दिन नारद जी बंसी नारायण मन्दिर में भगवान की नित्य पूजा नहीं कर पाए थे। उनकी अनुपस्थिति में उर्गम घाटी के कलगोठ गांव के एक स्थानीय चरवाहे/पुजारी ने भगवान की पूजा-अर्चना की थी।
तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि वर्ष के 364 दिन यहाँ मनुष्यों का आना वर्जित है और अदृश्य रूप से स्वयं देवर्षि नारद यहाँ भगवान की पूजा करते हैं। मनुष्यों को पूजा का अधिकार साल में सिर्फ उसी एक दिन (रक्षाबंधन) मिलता है जिस दिन नारद जी पाताल में थे। आज भी यहाँ के मुख्य पुजारी राजपूत (स्थानीय कलगोठ गांव के निवासी) होते हैं।
परंपरा के अनुसार रक्षाबंधन के दिन सुबह मंदिर के कपाट खुलते ही आसपास के गांवों (जैसे कलगोठ, किमाणा, डुमक आदि) की महिलाएँ और युवतियाँ अपने भाइयों को राखी बांधने से पहले भगवान बंसी नारायण को राखी अर्पित करती हैं। स्थानीय ग्रामीण अपने घरों से शुद्ध दूध, घी और ताजा मक्खन लेकर आते हैं जिससे भगवान का अभिषेक कर उन्हें छप्पन भोग लगाया जाता है। सूर्यास्त होते ही मंदिर को फिर से अगले एक वर्ष के लिए बंद कर दिया जाता है।
यह मंदिर उर्गम घाटी के ‘बंसा’ नामक आखिरी गांव से आगे की चढ़ाई पर स्थित है। बंसा क्षेत्र में स्थित नारायण मंदिर होने के कारण भी समय के साथ इसे ‘बंसी नारायण’ कहा जाने लगा।
उत्तराखंड के चमोली जिले में उर्गम घाटी में स्थित बंसी नारायण मंदिर तक केवल पैदल ही पहुंचा जा सकता है।
पहले आपको जोशीमठ तक जाना होगा जो देहरादून से लगभग 293 किमी की दूरी पर है।
जोशीमठ से, हेलंग की ओर, जो 22 किमी दूर है, और अंत में देवग्राम की ओर, हेलंग से 15 किमी दूर है।
बंसी नारायण मंदिर का ट्रेक देवग्राम से शुरू होता है और लगभग 12 से 15 किमी लंबा होता है।

3-अल्मोड़ा शहर के थाना/मल्ली बाजार में स्थित श्री मुरली मनोहर मंदिर भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित एक ऐतिहासिक और प्रसिद्ध मंदिर है। यह मंदिर ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1880 में बनाया गया था। मंदिर के गर्भगृह में भगवान श्रीकृष्ण (मुरली मनोहर) के साथ-साथ राधा और लक्ष्मीनारायण की सुंदर मूर्तियां स्थापित हैं, जो जोधपुरी संगमरमर से बनी हैं। इसके अलावा प्रांगण में गणेशजी और हनुमानजी की मूर्तियां भी हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर पत्थरों से बनी एक बेहद सुंदर नक्काशीदार नक्काशीदार कलाकृति है, जो इसकी भव्यता को बढ़ाती है। स्थानीय मान्यताओं और भक्तों के बीच ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना संतों और भक्तों के तप से जुड़ी है। यहाँ सच्चे मन से प्रार्थना करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर यहाँ सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है और विशेष पूजा-अर्चना व भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है।