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September 2, 2026

…तो 30 दिन की हिरासत पर पीएम और सीएम की कुर्सी जाएगी

 

संसदीय समिति ने प्रावधान पर जताई आपत्ति, ड्राफ्ट रिपोर्ट पर सवाल उठाए

नई दिल्ली। 

प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को 30 दिन की हिरासत पर पद से हटाने वाले प्रावधान पर संसदीय समिति ने सवाल उठाए। ड्राफ्ट रिपोर्ट में इस नियम में बदलाव का संकेत दिया गया है। रिपोर्ट में माना गया है कि अधिकांश हितधारकों ने इस प्रावधान को संवैधानिक रूप से विवादित बताया है, क्योंकि यह किसी व्यक्ति के दोषी साबित होने से पहले ही कार्रवाई का आधार बनाता है।

संसद की एक प्रमुख समिति भ्रष्टाचार निरोधक विधेयक पर अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है। रिपोर्ट के अनुसार, अधिकांश हितधारकों ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या किसी मंत्री को लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहने पर पद से हटाने का प्रावधान लागू किया जाता है, तो यह संविधान की भावना के अनुरूप नहीं होगा। उनका तर्क है कि यह प्रावधान किसी न्यायिक निर्णय या दोष सिद्ध होने से जुड़ा नहीं है।

‘हटाने’ की जगह ‘निलंबन’ शब्द का सुझाव
सूत्रों के मुताबिक, ड्राफ्ट रिपोर्ट में प्रावधान को पूरी तरह हटाने के बजाय ‘रिमूवल’ (पद से हटाना) की जगह ‘सस्पेंशन’ (निलंबन) शब्द इस्तेमाल करने की सिफारिश की गई है, ताकि संबंधित व्यक्ति पर दोषी होने की छवि न बने। हालांकि, गृह मंत्रालय ने इस सुझाव पर आपत्ति जताई है। मंत्रालय का कहना है कि ‘निलंबन’ का अर्थ है कि व्यक्ति पद और अधिकार तो बनाए रखता है, लेकिन केवल अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर सकता, इसलिए यह शब्द कानूनी रूप से उपयुक्त नहीं माना जा सकता।

‘सनसेट क्लॉज’ जोड़ने की भी सिफारिश
ड्राफ्ट रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि विधेयक में ‘सनसेट क्लॉज’ या स्वचालित बहाली (Automatic Reversal Clause) का प्रावधान जोड़ा जाए। इसके तहत यदि संबंधित व्यक्ति को अदालत से राहत मिल जाती है, आरोपों से मुक्त कर दिया जाता है या तय समय के भीतर अभियोजन आगे नहीं बढ़ पाता, तो उसे फिर से पद पर बहाल किया जा सके। समिति का मानना है कि केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को स्थायी रूप से सार्वजनिक पद से वंचित करना उचित नहीं होगा।

चार्जशीट के बाद कार्रवाई का भी सुझाव
ड्राफ्ट रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि ’30 दिन की हिरासत को आधार बनाने के बजाय कई हितधारकों ने सुझाव दिया है कि कार्रवाई का मानदंड अदालत की ओर से आरोप तय (Framing of Charges) किए जाने के चरण को बनाया जाए।’ फिलहाल रिपोर्ट में संशोधन की गुंजाइश बनी हुई है और समिति के बहुमत से इसमें बदलाव संभव है। रिपोर्ट मंजूर होने के बाद इसे लोकसभा में पेश किया जाएगा, जिसके बाद सरकार इस विधेयक को संसद से पारित कराकर कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकती है।