कांवड़ यात्रा एक तप, जिसे वही करता है, जो हो महादेव का अनन्य भक्त
विनीत नारायण
कांवड़ यात्रा को लेकर हाल के वर्षों में जहां एक और युवाओं में भारी उत्साह बढ़ा है, यहीं इस यात्रा को लेकर कई विवाद भी होते दिखाई देते हैं। पुराणों के अनुसार, कांवड़ उठाने की परंपरा समुद्र मंथन के समय से प्रारंभ हुई थी, जब मंथन से निकले हलाहल विष को शिव ने अपने कंठ में धारण कर ब्रह्मांड की रक्षा की थी। विष के इस ताप को शीतल करने के उद्देश्य से सभी देवताओं ने भोले शंकर का गंगाजल से अभिषेक किया। इसके अलावा अन्य युगों में परशुराम जी ने और शिवभक्त लंकापति रावण ने भी कांवड़ यात्रा की थी।
कांवड़ यात्रा की वर्तमान परंपरा सत्रहवीं शताब्दी से प्रारंभ हुई। पहले कांवड़ उठाने वाले शिवभक्त या तो प्रौढ़ और वृद्ध होते थे या साधु-संन्यासी। गृहस्थ और युवाओं का कांवड़ यात्रा में प्रतिनिधित्व नगण्य होता था। वे सभी अपने परिवारों की परंपरा के अनुसार, अत्यंत साधारण वस्त्र पहनकर कांवड़ यात्रा करते थे। प्रायः दो यात्रियों के वस्त्र एक से रंग के नहीं होते थे। भारत के विभिन्न अंचलों के लोग अपनी पारंपरिक पोशाक में जब कांवड़ लेकर चलते थे, तो एक मनोरम झांकी दिखती थी। इस यात्रा के नियम बहुत कड़े होते हैं। उनका पालन मर्यादा में रहकर करना होता है। कांवड़ यात्रा करना एक तरह की तपस्या है, जिसे वही करता है, जो महादेव का अनन्य भक्त होता है।
यात्रा के कुछ नियम इस प्रकार हैं; – कि कांवड़ यात्रा के दौरान कांवड़िये को किसी भी तरह के सामिष भोजन, नशा या सुख-सुविधाओं से पूरी तरह दूर रहना होता है। उसे निरर्थक वार्ता, संवाद, कलह, उत्तेजना, क्रोध या अहंकार से रहित होकर अत्यंत दीन-हीन भाव से विनम्रतापूर्वक यह यात्रा करनी होती है। पूरी यात्रा के दौरान सच्चा कांवड़िया लगातार, मन ही मन भोले शंकर का नाम जपता रहता है। इस यात्रा को गहरी आस्था, आत्म-अनुशासन, धैर्य और भोलेनाथ के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना से किए जाने की परंपरा है। इसके परिणामस्वरूप कांवड़िये को भोलेनाथ की कृपा मिलती है। उसके पापों का नाश होता है। उसकी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाने का मार्ग प्रशस्त होता है।
अब जरा आज के दौर में हो रही कांवड़ यात्रा के दृश्यों का स्मरण करते हैं। ऐसी घटनाएं कांवड़ यात्रा के दौरान सामने आती रहती हैं, जो दुर्भाग्यपूर्ण हैं। इसमें ऐसे तत्व भी शामिल होते हैं, जो डीजे के शोर, मनोरंजन और उपद्रव से मूल उद्देश्य को विरत करते हैं। इससे सच्चे श्रद्धालुओं को भी मुश्किलें होती हैं। पिछले कुछ वर्षों से कांवड़ यात्रा में कुछ समूहों द्वारा अपने वैभव के प्रदर्शन की भी होड़ दिखने लगी है।
राजनीतिक कारणों से प्रशासनिक कठिनाइयां अलग खड़ी हो जाती हैं। जबकि कांवड़ यात्रा के नियमों और मर्यादाओं का मार्ग उच्च है। भक्तिमार्ग की विशेषता ही है कि भक्त दीन-हीन बनकर अपने आराध्य को समर्पित होता है। तुलसीदास जी जैसे महान संत स्वयं को ‘कुटिल और कामी’ कहकर संबोधित करते हैं। शास्त्रों का प्रकांड पंडित रावण जैसा शिव भक्त, जिसने महादेव को प्रसन्न करने के लिए अपने शीश काट-काट कर भोलेनाथ पर न्योछावर कर दिए, लेकिन दीनता और विनम्रता के अभाव में और अहंकार में किस दुर्गति को प्राप्त हुआ, यह सर्वविदित है। इसलिए, हर कांवड़िये को चाहिए कि वह अपने आचरण को अनुकरणीय बनाए और इस पवित्र यात्रा के उद्देश्य को सार्थक करे और बनाए। साभार अमर उजाला
