इस गांव की महिलाएं पांच दिन तक रहतीं हैं निर्वस्त्र
कुल्लू-मनाली। डिजिटल युग की इस दुनिया में इन दिनों एक खबर जमकर वायरल हो रही है। पढ़कर आपको भले ही अजीब लगे। लेकिन, यह सच है कि आज भी हमारे देश में कई ऐसे क्षेत्र और गांव हैं जहां लोग परंपराओं को खूब जीते हैं और निभाते हैं। ऐसी ही एक परंपरा जिले के पीणी गांव की है। यहां की महिलाएं सावन-भादो के पांच दिन तक निर्वस्त्र रहकर व्रत करतीं हैं।
17 अगस्त से 21 अगस्त के बीच यहां के ग्रामीण काला महीना मनाते हैं। महिलाएं हर साल इन पांच दिनों के लिए विशेष व्रत करती हैं। व्रत के समय महिलाएं कपड़े नहीं पहनतीं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन पांच दिनों तक वे घर से बाहर भी नहीं निकलतीं। पूर्ण एकांत में रहतीं हैं। वे किसी से न मिलतीं हैं और न बातें करतीं हैं। हालांकि, इस प्रथा में मामूली बदलाव जरूर आया है। आजकल, कुछ महिलाएं अपने शरीर को ऊनी या रेशम के पतले कपड़े से ढक रही हैं। लेकिन, रहती अब भी अंदर और एकांत में ही हैं। पति-पत्नी एक-दूसरे से किसी भी तरह की कोई बात नहीं करते। बिल्कुल अजनबी बनकर रहते हैं। जब महिलाएं ये परंपरा निभा रही होती हैं तो उस दौरान पुरुष भी मांस और शराब का सेवन बिल्कुल नहीं करते। खास बात यह भी है कि इन पांच दिनों तक बाहरी व्यक्ति का गांव में प्रवेश प्रतिबंधित रहता है।
क्या है मान्यता
मान्यता के अनुसार, सदियों पहले इस गांव पर क्रूर राक्षसों का राज हुआ करता था। वे राक्षस सुंदर वस्त्र पहने विवाहित महिलाओं का अपहरण कर उनकी हत्या कर दे रहे थे। इससे ग्रामीण परेशान और भयभीत थे। उन्होंने अपनी संरक्षक देवी ‘लाहुआ घोंट’ से इन राक्षसों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। कहा जाता है ग्रामीणों की पूजा और प्रार्थना के बाद, देवी गांव में आईं और राक्षसों का वध किया। उसके बाद से गांव में खुशहाली आई। उस घटना की याद में और भविष्य में किसी भी बुरी शक्ति के गांव में प्रवेश न करने की गारंटी के लिए यह रस्म आज भी गांव में जारी है। यहां के लोगों का मानना है कि यदि उनकी महिलाएं यह पांच दिन का व्रत नहीं करेंगी तो देवता नाराज हो जाएंगे।
प्रेम, विश्वास और सामुदायिक बंधन का प्रतीक होती हैं मान्यताएं
स्थानीय लोग इस परंपरा को अपने पूर्वजों की धरोहर मानते हैं और पूरे विश्वास के साथ इसे आज भी श्रद्धा से निभाते हैं। यह परंपरा केवल एक रस्म नहीं, बल्कि उनके सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों का हिस्सा है, जो उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ कर रखता है। पीणी गांव की यह परंपरा इस बात का उदाहरण हैं कि भारत का हर गांव अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान रखता है। यहां की परंपराएं केवल रस्में नहीं हैं, बल्कि प्रेम, विश्वास और सामुदायिक बंधन का प्रतीक भी हैं।
