15 साल की उम्र में स्कूल छोड़ा, सहारनपुर की हर्षिता अरोड़ा कैसे बनी 6700 करोड़ की कंपनी की मालकिन?
सहारनपुर। यूपी का एक छोटा सा शहर, सहारनपुर- जहां 15 साल की एक बच्ची ने बस्ता उठाया और स्कूल को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। न कोई डिग्री, न कोई कॉलेज की चौखट। लेकिन अप्रैल 2026 में, वो लड़की दुनिया के सबसे ताकतवर स्टार्टअप इनक्यूबेटर की ‘जनरल पार्टनर’ बन चुकी है। आज जीरो से हीरो में कहानी इस स्कूल ड्रॉपआउट की।
कोडिंग सीखी और छोड़ दिया स्कूल
एक स्कूल ड्रॉपआउट लड़की हर्षिता 13 साल की थीं। उनके पाइनवुड स्कूल में एक कंप्यूटर टीचर ने बच्चों को पोस्टर डिजाइन और बेसिक प्रोग्रामिंग सिखाई। बस, हर्षिता को जैसे अलादीन का चिराग मिल गया1 उन्हें ये दुनिया इतनी भाई कि उन्होंने आईटी मैगजीन खंगाल मारी, इंटरनेट से कोडिंग घोट कर पी ली। और फिर एक दिन उन्हें लगा, “ये स्कूल की किताबें मेरे किसी काम की नहीं हैं।” उन्होंने स्कूल छोड़ने का ऐसा फैसला लिया जो अच्छे-अच्छों के पसीने छुड़ा दे। कुछ दिन होम-स्कूलिंग की, फिर वो भी छोड़ दी। पूरा फोकस सिर्फ कोडिंग और प्रोजेक्ट्स पर।
मां-बाप बने ढाल, बेटी को अकेले भेज दिया अमेरिका
इसमें उनके माता-पिता ढाल बनकर खड़े रहे। उनके पिता रविंद्र सिंह अरोड़ा जो सहारनपुर में एक फाइनेंसियल ब्रोकर थे, उन्होंने अपनी 15 साल की बेटी को अकेले अमेरिका तक जाने दिया। ये किसी आम हिंदुस्तानी परिवार के लिए बहुत बड़ी बात हो सकती है। 2016 में उन्होंने बेंगलुरु में इंटर्नशिप की, अमेरिका के MIT लॉन्च प्रोग्राम में हिस्सा लिया, और iOS ऐप बनाना सीखा। घर लौटीं, तो अपनी पहली सीरियस ऐप बना डाली- ‘क्रिप्टो प्राइस ट्रैकर’। जनवरी 2018 का वक्त था, क्रिप्टो का बुखार सबके सिर चढ़ कर बोल रहा था। लेकिन बाजार में जो ऐप्स थे, वो जलेबी की तरह उलझे हुए थे। 16 साल की हर्षिता ने अपने बेडरूम में बैठकर, लैपटॉप पर दो महीने में एक ऐसी सिंपल ऐप बनाई, जो 1000 से ज्यादा करेंसी का पल-पल का भाव बताती थी।
ऐप बनाई तो धमकियां देने लगे लोग
नतीजा? Apple ने इसे फीचर किया। ये अमेरिका और कनाडा में टॉप पेड ऐप्स में छा गई। बाद में किसी ने इसे खरीद भी लिया। लेकिन रुतबा इतनी आसानी से नहीं मिलता। जब ऐप हिट हुई, तो लोगों की आंखों में खटकने लगी। उंगलियां उठीं कि इतनी छोटी लड़की ये कैसे बना सकती है? लोगों ने चोरी का इल्जाम लगाया। इंटरनेट पर धमकियां मिलने लगीं। लेकिन हर्षिता ने हार नहीं मानी।
पीएम मोदी ने थपथपाई पीठ
इसी जज्बे के लिए 2020 में भारत सरकार ने उन्हें ‘बाल शक्ति पुरस्कार से नवाजा। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने उनकी पीठ थपथपाई। फोर्ब्स की अंडर-30 लिस्ट में उनका नाम चमका। और फिर खुला अमेरिका का दरवाजा। उन्हें मिला अमेरिका का स्पेशल O-1 वीजा, जो सिर्फ एक्स्ट्रा-ऑर्डिनरी टैलेंट वालों को मिलता है। 16 साल की उम्र में सहारनपुर की वो लड़की अकेली सैन फ्रांसिस्को की सड़कों पर अपनी किस्मत लिखने निकल पड़ी।
अमेरिका में चुनौतियां, कोविड की मुसीबत
वहां जाकर 2019 में उन्होंने विगनन वेलीवेला और तुषार मिश्रा के साथ ‘AtoB’ नाम की कंपनी शुरू की। पहले एक आइडिया YC के सामने रखा था, लेकिन कोविड ने उस पर पानी फेर दिया। अक्सर लोग यहां आकर हथियार डाल देते हैं। लेकिन इन्होंने ऐसा पहाड़ चुना, जिसके बारे में इन्हें कुछ पता नहीं था- ‘ट्रकिंग इंडस्ट्री. न ट्रकिंग का ज्ञान, न पेमेंट का। लेकिन ये हफ्तों तक ट्रक स्टॉप्स की खाक छानते रहे। ट्रक वालों का दर्द समझा। अमेरिका में ट्रकिंग 66 लाख करोड़ रुपये का भारी-भरकम बाजार है, लेकिन पेमेंट का तरीका बैलगाड़ी के जमाने का था। हिडन फीस, पेपर चेक, फ्रॉड का डर।
AtoB ने इस मर्ज की सही दवा दी। जीरो फीस वाले फ्लीट कार्ड, इंस्टेंट पेमेंट और मॉडर्न टूल्स। लोग इसे ट्रकों का ‘स्ट्राइप’ कहने लगे। आज कंपनी 6700 करोड़ की वैल्यूएशन पर है। बड़े-बड़े दिग्गज इसमें पैसा लगा चुके हैं। इसी ट्रैक रिकॉर्ड ने YC को हर्षिता के आगे झुकने पर मजबूर कर दिया। पहले 2025 में वो सबसे कम उम्र की विजिटिंग पार्टनर बनीं, और अब 6 अप्रैल 2026 को वो सीधे YC की जनरल पार्टनर बन गई हैं। अब वो तय करेंगी कि दुनिया का अगला Airbnb कौन होगा।
आखिर वाई-कॉम्बिनेटर है क्या?
अब आप सोच रहे होंगे कि ये वाई-कॉम्बिनेटर या ‘YC’ आखिर किस चिड़िया का नाम है? इसे समझे बिना इस खबर का वजन आप तक नहीं पहुंचेगा। YC अमेरिका का एक ऐसा कुबेर का खजाना है, जो 2005 में शुरू हुआ था। इनका काम है नए-नए स्टार्टअप्स को पहले पैसा देना, उन्हें उंगली पकड़ कर चलना सिखाना और बड़े इन्वेस्टर्स से मिलवाना। Airbnb, Reddit, Dropbox, Stripe ये सब दिग्गज कंपनियां YC की ही देन हैं। यहां हर साल हजारों लोग किस्मत आजमाते हैं, लेकिन एंट्री सिर्फ 1 से 2 प्रतिशत को ही मिल पाती है। YC चलाने वाले जो सबसे बड़े बॉस होते हैं, उन्हें ‘जनरल पार्टनर्स’ या GP कहा जाता है। ये वो लोग हैं जो तय करते हैं कि किस आइडिया में दम है और किस पर पैसा लगेगा।
दोस्तों, ये सिर्फ एक सक्सेस स्टोरी नहीं है. ये एक सबक है। न कोई IIT, न कोई स्टैनफोर्ड, न रईस खानदान। सिर्फ इंटरनेट, किताबें, जमीन पर उतरकर काम करने की जिद और मां-बाप का भरोसा। ये कहानी चीख-चीख कर कहती है कि टेक की दुनिया में एंट्री सिर्फ डिग्री से नहीं मिलती। अगर आपमें आग है, तो कोई भी रास्ता आपको अपनी मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकता। साभार एनडीटीवी
