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August 30, 2026

डेमोग्रॉफी : 25 साल में देहरादून जिले में बेतहाशा बढ़ी मुस्लिम आबादी

 

राजकुमार दक्ष

देहरादून जिले में वर्ष 2000 से 2025 तक जनसांख्यिकीय परिवर्तन एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। उत्तराखंड राज्य के गठन (वर्ष 2000) के बाद से देहरादून, जो राज्य की अस्थायी राजधानी भी है, में शहरीकरण, प्रवासन (माइग्रेशन) और जनसंख्या वृद्धि में तेजी देखी गई है। चूंकि 2021 में होने वाली जनगणना अभी नहीं हुई है, इसलिए वर्ष 2000 से 2025 तक के सटीक और आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। उपलब्ध जानकारी मुख्य रूप से 2001 और 2011 की जनगणना तथा विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और अनुमानों पर आधारित है।
देहरादून जिला वर्ष 2000 में सबसे तेजी से बदलते जनसांख्यिकीय स्वरूपों में से एक रहा है। राज्य की राजधानी होने के कारण यहां तीव्र शहरीकरण, अंतर्राज्यीय प्रवासन और आर्थिक विकास के कारण बड़े पैमाने पर आबादी का जमाव हुआ है, जिससे शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों की संरचना में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं। देहरादून में शहरी विकास की गति ग्रामीण विकास से कहीं अधिक रही है, जिससे जिले का कुल जनसांख्यिकीय संतुलन मैदानी और शहरी क्षेत्रों के पक्ष में झुक गया है।

शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में परिवर्तन
देहरादून जिले में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जनसंख्या में वर्ष 2001 से 2011 के दौरान काफी वृद्धि हुई। यह वृद्धि दर राज्य की औसत वृद्धि दर से अधिक रही है, जिसका मुख्य कारण अंतरराज्यीय प्रवास है।

क्षेत्र वर्ष 2001 (लगभग) वर्ष 2011 (आंकड़े)
जिले की कुल आबादी 12,82,143 16,96,694
शहरी आबादी 6,35,019 (लगभग) 9,40,432
ग्रामीण आबादी 6,47,124 (लगभग) 7,56,262

शहरी क्षेत्रों में वृद्धि :
राज्य के शहरीकरण की दर राष्ट्रीय औसत के करीब है। 2001-2011 के दशक में उत्तराखंड की शहरी जनसंख्या में लगभग 39.94 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो ग्रामीण वृद्धि दर से बहुत अधिक है। देहरादून शहर और इसके आसपास के क्षेत्रों जैसे बंजारावाला, किशननगर, नेहरूग्राम, हर्रावाला और रायपुर वार्डों की आबादी में बीते वर्षों में दो से तीन गुना तक तेजी से वृद्धि दर्ज की गई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कमी/पलायन :
राज्य के कई पहाड़ी जिलों में ग्रामीण जनसंख्या में कमी आई है। हालांकि, देहरादून जैसे मैदानी जिले में कुल ग्रामीण आबादी बढ़ी है, लेकिन यह वृद्धि शहरी क्षेत्रों की तुलना में धीमी रही है। इसका मुख्य कारण बेहतर शिक्षा, रोजगार और जीवन-यापन की तलाश में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन है।

जनसांख्यिकीय परिवर्तन के कारण
उत्तराखंड की राजधानी बनना : वर्ष 2000 में राज्य के गठन के बाद प्रशासनिक, शैक्षिक और व्यावसायिक गतिविधियों का केंद्र बनने से देहरादून में जनसंख्या का तेजी से जमाव हुआ।
शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं : देहरादून को ‘स्कूलों का शहर’ भी कहा जाता है। उच्च शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए लोग यहां आकर बसते हैं।
औद्योगिकीकरण और रोजगार : जिले, विशेषकर मैदानी क्षेत्रों में औद्योगिक विकास और नए रोजगार के अवसरों ने बाहरी राज्यों से लोगों को आकर्षित किया।
पलायन : पड़ोसी राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों से बेहतर जीवन की तलाश में लोग देहरादून की ओर पलायन कर रहे हैं।

मुस्लिम आबादी में वृद्धि वाले क्षेत्र
मीडिया रिपोर्ट्स और शोधों के अनुसार, देहरादून जिले के कुछ विशिष्ट क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी के अनुपात में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे यहां की डेमोग्राॅफी बदल गई है।

प्रमुख क्षेत्र
देहरादून में विकासनगर, ऋषिकेश और डोईवाला क्षेत्रों से सटे इलाकों में यह बदलाव प्रमुख रूप से देखा गया है :-
विकासनगर क्षेत्र : सहसपुर, खुशहालपुर, बैरागीवाला, ढकरानी, कुल्हाल, ढालीपुर, जीवनगढ़, अंबाड़ी, सभावाला, हसनपुर जाटवाला आदि।ऋषिकेश व डोईवाला क्षेत्र : रायवाला, छिद्दरवाला, गुमानीवाला, आइडीपीएल, बुल्लावाला, झबरावाला, तेलीवाला, बंजारावाला, कुड़कावाला, जौलीग्रांट, केशवपुरी बस्ती आदि।
पछवादून : देहरादून का पश्चिमी क्षेत्र, जो हिमाचल और यूपी की सीमा से लगता है, विशेष रूप से चर्चा में रहा है, जहां 28 गांव हिंदू-बहुल से मुस्लिम-बहुल हो चुके हैं। उदाहरण के लिए, ढकरानी गांव में 2011 में हिंदू 60 प्रतिशत और मुस्लिम 40 प्रतिशत थे, जो अब बदलकर क्रमशः 40 प्रतिशत और 60 प्रतिशत हो गए हैं (अनुमानित)।

जनसंख्या के आंकड़े (अनुमानित और सांकेतिक)
चूंकि क्षेत्र-विशिष्ट, धर्म-आधारित जनसंख्या के आंकड़े 2011 की जनगणना के बाद सार्वजनिक नहीं हुए हैं, इसलिए 2000 और 2025 के बीच की तुलना अनुमानित है :-
– उत्तराखंड राज्य स्तर पर, 2001 की जनगणना में मुस्लिम आबादी 11.92 प्रतिशत थी, जो 2011 में बढ़कर 13.95 प्रतिशत हो गई।
– मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2022 तक यह अनुपात 16 प्रतिशत से अधिक होने का अनुमान लगाया गया है।
– देहरादून जिले में मुस्लिम आबादी का अनुपात 32 प्रतिशत तक होने का अनुमान है, जबकि हरिद्वार में यह 38 प्रतिशत तक पहुंच गया है (गैर-आधिकारिक अनुमान)।

कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, इन क्षेत्रों में मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या में दो से ढाई गुना तक की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि अन्य समुदायों में यह वृद्धि लगभग 50 प्रतिशत से 60 प्रतिशत रही है।

आबादी वृद्धि के कारण

जनसंख्या में इस असंतुलित वृद्धि के पीछे कई कारण बताए जाते हैं :-
बाहरी प्रवासन : उत्तराखंड से सटे राज्यों (उत्तर प्रदेश, बिहार) के साथ-साथ बांग्लादेश और म्यांमार (रोहिंग्या) से भी अवैध घुसपैठ और बसावट की आशंका जताई गई है।
बेहतर रोजगार और कृषि भूमि : मैदानी क्षेत्रों में कृषि (जैसे बासमती चावल) और अन्य रोजगार के अवसरों ने बाहरी लोगों को आकर्षित किया।सरकारी भूमि पर अवैध बसावट : कई रिपोर्ट्स ने सरकारी जमीन, नदी-नहरों के किनारे और वन क्षेत्रों पर अवैध रूप से कच्चे-पक्के मकान बनाकर बस्ती बसाने की बात कही है।
आंतरिक कारक : कुछ रिपोर्ट्स में परिवार रजिस्टरों में हेर-फेर करने और स्थानीय मुस्लिम प्रधानों की कथित भूमिका के माध्यम से बाहरी आबादी को बसाने के आरोप भी लगे हैं।

शहरी और ग्रामीण आबादी का अनुपात

जनसांख्यिकीय संकेतक वर्ष 2001 (आंकड़े) वर्ष 2011 (आंकड़े) वर्ष 2025 (अनुमानित)
जिले की कुल आबादी 12,82,143 16,96,694 लगभग 21,00,000 (जिले की)
शहरी आबादी लगभग 49.5 प्रतिशत 55.45 प्रतिशत (9,40,432) 60 प्रतिशत से अधिक
ग्रामीण आबादी लगभग 50.5 प्रतिशत 44.55 प्रतिशत (7,56,262) 40 प्रतिशत से कम
दशकीय वृद्धि दर 25.10 प्रतिशत (2001-2011) 32.48 प्रतिशत (जिले की, 2001-2011) 20−25 प्रतिशत (अनुमानित 2011-2021)

शहरी क्षेत्रों में उछाल : देहरादून शहर के नगर निगम क्षेत्रों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। उदाहरण के लिए, 2011 में बंजारावाला वार्ड की आबादी लगभग 12,000 थी, जो मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अब 24,000 के करीब बताई जाती है (लगभग दो गुना वृद्धि)। अन्य तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्र किशननगर, रायपुर और हर्रावाला हैं। जहां बुनियादी ढांचे और सुविधाओं के कारण आबादी का घनत्व तेजी से बढ़ा है।
ग्रामीण-शहरी प्रवास : ग्रामीण आबादी की वृद्धि दर धीमी रही है, जिसका मुख्य कारण बेहतर अवसर, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की तलाश में पहाड़ी (आंतरिक) और ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन है।
मुस्लिम आबादी में वृद्धि चिंताजनक : देहरादून जिले के कुछ क्षेत्रों में, विशेष रूप से यूपी और हिमाचल प्रदेश की सीमा से लगे इलाकों में, मुस्लिम आबादी के अनुपात में हुई वृद्धि चिंताजनक है।

मुस्लिम आबादी का राज्य-स्तरीय परिदृश्य
क्षेत्र वर्ष 2001 (प्रतिशत) वर्ष 2011 (प्रतिशत) वर्ष 2022/2025 (अनुमानित प्रतिशत)
उत्तराखंड राज्य 11.92 प्रतिशत 13.95 प्रतिशत 16 प्रतिशत से अधिक
देहरादून जिला 13.12 प्रतिशत 13.99 प्रतिशत 17-18 प्रतिशत (अनुमानित)
(स्रोत : जनगणना 2001, 2011, मीडिया और शोध रिपोर्ट)

मुस्लिम आबादी बढ़ने वाले प्रमुख क्षेत्र
देहरादून जिले के कुछ सीमांत और मैदानी क्षेत्र हैं जहां मुस्लिम आबादी के अनुपात में सबसे बड़ा बदलाव आया है। ये परिवर्तन अनुपात के रूप में (अर्थात् एक समुदाय की प्रतिशत हिस्सेदारी का बढ़ना) अधिक महत्वपूर्ण हैं, न कि केवल संख्यात्मक रूप से।

क्षेत्र का नाम वर्ष 2000 (लगभग) वर्ष 2025 (अनुमानित) प्रमुख क्षेत्र
पछवादून : हिंदू-बहुल तेजी से मुस्लिम-बहुल विकासनगर, सहसपुर, ढकरानी, ढलीपुर, कुल्हाल, हरबर्टपुर।
ऋषिकेश-डोईवाला बेल्ट : स्थिर/सामान्य वृद्धि बढ़ी हुई आबादी रायवाला, छिद्दरवाला, जौलीग्रांट, कुड़कावाला।
देहरादून शहर के बाहरी इलाके सामान्य वृद्धि बढ़ी हुई आबादी सेलाकुई (औद्योगिक क्षेत्र), प्रेम नगर, शिमला बाईपास क्षेत्र।

अधिक डेमोग्राफी वाले क्षेत्र
ढकरानी : रिपोर्ट्स के अनुसार, 2011 में यहां की आबादी में 60 प्रतिशत हिंदू और 40 प्रतिशत मुस्लिम थे, लेकिन वर्तमान (2025) अनुमानों के अनुसार, मुस्लिम आबादी 60 प्रतिशत हो गई है, और हिंदू आबादी घटकर 40 प्रतिशत रह गई है।
ढालीपुर : इसी तरह, जहां कभी हिंदू आबादी 75 प्रतिशत थी, वह अब 50-50 प्रतिशत के अनुपात में बंट गई है।
पछवादून के 28 गांव : मीडिया रिपोर्ट्स और सरकारी जांच के अनुसार, पश्चिम देहरादून के लगभग 28 गांव ऐसे हैं जो पहले हिंदू-बहुल हुआ करते थे, लेकिन अब वे मुस्लिम-बहुल हो गए हैं।

जनसंख्या वृद्धि के ये हैं मुख्य कारण

मुस्लिम आबादी में इस असंतुलित वृद्धि के पीछे बहुआयामी कारण बताए जाते हैं, जिनमें से कई पर राज्य सरकार द्वारा भी जांच की जा रही है, जिनमें से प्रमुख ये हैं : –
आंतरिक : उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों से रोजगार के लिए मैदानी क्षेत्रों में मुस्लिमों का प्रवास।
बाहरी : उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों से सस्ते श्रम, खनन/ठेकेदारी, और छोटे-मोटे व्यापार (जैसे फड़, खोखे, फल-सब्जी विक्रेता) के लिए बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी का देहरादून में आना और बसना।
अवैध घुसपैठ : कुछ रिपोर्ट्स में बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुस्लिमों की अवैध घुसपैठ की आशंका भी जताई गई है, जो सीमावर्ती क्षेत्रों और सरकारी/वन भूमि पर बस गए हैं।
सरकारी/वन भूमि पर अवैध कब्जा : यह सबसे बड़ा कारण माना जाता है। बाहरी आबादी ने नदी-नालों के किनारे, रेलवे और वन विभाग की जमीनों पर अवैध रूप से कच्चे-पक्के मकानों का निर्माण कर लिया है। रिपोर्टों के अनुसार, अवैध मजारों और धार्मिक स्थलों के नाम पर भी सरकारी जमीनों पर कब्जा किया गया है।
भू-कानून की शिथिलता : हिमाचल प्रदेश में सख्त भू-कानून है, इसलिए बाहरी लोग वहां जमीन खरीद या कब्जा नहीं कर पाते। उत्तराखंड में (विशेष रूप से मैदानी जिलों में) भू-कानून में अधिक ढील होने के कारण बाहरी आबादी को यहां बसने में आसानी हुई है।

प्रशासनिक और राजनीतिक कारण

परिवार रजिस्टर में हेरफेर : कुछ क्षेत्रों में, स्थानीय मुस्लिम ग्राम प्रधानों और ग्राम पंचायत अधिकारियों की मिलीभगत से बाहरी लोगों के नामों को परिवार रजिस्टरों में गलत तरीके से दर्ज करने की शिकायतें सामने आई हैं।
वोट बैंक की राजनीति : अवैध रूप से बसे लोगों को स्थानीय आधार कार्ड और वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराने में मदद मिली है, जिससे यह आबादी कुछ विधानसभा सीटों पर चुनावी परिणाम को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।