एक करोड़ रुपये से शुरू कारोबार आज दुनिया के 40 देशों में फैला
नई दिल्ली| कभी सिर्फ एक मिल से शुरू हुआ कारोबार आज दुनिया के कोने-कोने तक पहुंच चुका है। लेकिन इस कहानी की सबसे दिलचस्प बात कारोबार का इतना बड़ा होना नहीं, बल्कि यह है कि इसकी शुरुआत ऐसे दौर में हुई, जब विदेश में पैसा लगाना भारतीय कारोबारियों के लिए आसान नहीं था। जेब में निवेश के लिए पर्याप्त पैसा नहीं था, देश में विदेशी मुद्रा के सख्त नियम थे और नौकरशाही की पाबंदियां अलग।
फिर भी एक भारतीय कारोबारी ने ऐसा रास्ता चुना, जिसने आगे चलकर दुनिया के कई देशों को उसके कारोबार का ठिकाना बना दिया। हालात ऐसे बदले कि जिन देशों में कभी निवेश करना मुश्किल था, वहां की सरकारें और राष्ट्राध्यक्ष खुद उसे अपने देश में कारोबार फैलाने के लिए बुलाने लगे।
अब सवाल यह है कि आखिर कौन था वह कारोबारी, जिसने मजबूरियों को मौका बनाया और विदेशी धरती से भारतीय कारोबार का झंडा बुलंद किया? दरअसल, ये कहानी है- आदित्य बिड़ला की, जिनका कारोबारी सफर दक्षिण-पूर्व एशिया से शुरू होकर दुनिया के कई हिस्सों तक पहुंचा।
1970 के दशक में थाईलैंड से शुरू किया सफर
आज जिस कॉरपोरेट ग्रुप को दुनिया भर में पहचान मिली, उसकी विदेश यात्रा की शुरुआत बेहद छोटे कदम से हुई थी। 1960 के दशक के आखिर और 1970 के दशक की शुरुआत में थाईलैंड विदेशी निवेश के लिए अपनी अर्थव्यवस्था खोल रहा था। वहां निवेशकों को आठ साल तक कॉरपोरेट और डिविडेंड टैक्स से छूट मिलती थी। पूंजीगत उपकरणों के आयात पर भी कोई शुल्क नहीं था। बिड़ला ने इसी मौके को पहचाना।
1 करोड़ की मिल से शुरू हुआ विदेशी सफर
बिड़ला का पहला अंतरराष्ट्रीय कारोबार 1 करोड़ रुपए की टेक्सटाइल मिल था। शुरुआत छोटी थी, लेकिन पहला बड़ा ऑर्डर भी जल्द मिल गया। थाई एयरवेज ने अपनी एयर होस्टेस की यूनिफॉर्म के लिए बिड़ला की कंपनी को ऑर्डर दिया। फिर यही छोटी मिल आगे चलकर तीन और मिलों की नींव बनी। एक थाईलैंड में, दूसरी इंडोनेशिया में और तीसरी फिलीपींस में।
इस बीच फिलीपींस से भी बिड़ला के रिश्ते मजबूत हुए। आदित्य बिड़ला अपने दादा के पुराने दोस्त और फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस से मिलने पहुंचे थे। इसके बाद उन्हें भारत में फिलीपींस का मानद कौंसल बना दिया गया। युवा बिड़ला के लिए पासपोर्ट पर हस्ताक्षर करना और वीजा जारी करना भले ही रोमांचक अनुभव था, लेकिन असली लक्ष्य इससे कहीं बड़ा था। और वो था- विदेश में कारोबार खड़ा करना।
10 कंपनियां, 10 करोड़ डॉलर की बिक्री
1970 से 1980 के बीच बिड़ला ने दक्षिण-पूर्व एशिया में 10 कंपनियां खड़ी कर दीं। इनकी कुल बिक्री करीब 10 करोड़ डॉलर थी। 1990 के दशक के मध्य तक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी। बिड़ला मलेशिया में दुनिया की सबसे बड़ी पाम ऑयल रिफाइनरी चला रहे थे और उनका सबसे बड़ा निवेश थाईलैंड में था।
1990 तक 1200 करोड़ का विदेशी साम्राज्य
साल 1990 में बिड़ला के पास थाईलैंड, मलेशिया, इंडोनेशिया और फिलीपींस में 12 कंपनियां थीं। इन कंपनियों का साम्राज्य करीब 1,200 करोड़ रुपए का था। 1995 तक यह साम्राज्य और बड़ा हो चुका था। 14 देशों में 17 कंपनियां थीं और कुल बिक्री 5,200 करोड़ रुपए तक पहुंच गई थी। यानी जिस कारोबारी के पास कभी अमेरिका और यूरोप में निवेश करने के लिए पर्याप्त पैसा नहीं था, उसने दो दशक से कुछ ज्यादा समय में दक्षिण-पूर्व एशिया को अपना बड़ा कारोबारी मैदान बना दिया।
भारत में छिपा रहा बिड़ला का विदेशी साम्राज्य
दिलचस्प बात यह है कि 1990 के शुरुआती सालों तक भारत में बहुत कम लोगों को बिड़ला के विदेशी कारोबार की असली ताकत का अंदाजा था। MRTP (मोनोपॉलीज एंड रेस्ट्रिक्टिव ट्रेड प्रेक्टिसेज एक्ट, 1969), FERA (फॉरेन एक्सचेंज रेग्युलेशन एक्ट, 1973) और दूसरे नियमों के दौर में विदेशी कारोबार को लेकर पारदर्शिता भी सीमित थी। बिड़ला की ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय कंपनियां निजी तौर पर नियंत्रित थीं। 13 कंपनियों में सिर्फ थाई रेयॉन और थाई कार्बन स्थानीय शेयर बाजारों में सूचीबद्ध थीं।
1990 के बाद बिड़ला ने अपने विदेशी कारोबार को ज्यादा खुलकर सामने रखना शुरू किया। कंपनियां शानदार मुनाफा कमा रही थीं। बिड़ला ने दावा किया कि अमेरिकी, जापानी, यूरोपीय और दक्षिण-पूर्व एशियाई कंपनियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा के बावजूद उनका समूह भारी मुनाफा कमा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले साल 50 से 100 फीसदी तक डिविडेंड दिया गया था।
22 फीसदी मुनाफे पर रखते थे नजर
बिड़ला की कारोबारी रणनीति का सबसे अहम हिस्सा था- मुनाफा। वह ऐसे कारोबार में आसानी से प्रवेश नहीं करते थे, जिसमें इक्विटी पर कम से कम 22 फीसदी रिटर्न मिलने की उम्मीद न हो। 1993 के बिजनेस वर्ल्ड सर्वे में ग्रासिम भारत की दूसरी सबसे अमीर कंपनी और हिंडाल्को छठी सबसे अमीर कंपनी थी।
कार्बन ब्लैक ने बनाया ग्लोबल खिलाड़ी
1988 में बिड़ला ने इंडियन रेयॉन के कारोबार में कार्बन ब्लैक जोड़ा। भारत में 20,000 टन सालाना क्षमता से शुरुआत हुई, जिसे 1989 में बढ़ाकर 50,000 टन कर दिया गया। इसके बाद थाईलैंड और मिस्र में प्लांट लगाए गए और बिड़ला इस कारोबार में दुनिया के छठे सबसे बड़े निर्माता बन गए। बाद में पोलैंड और रोमानिया में भी कार्बन ब्लैक प्लांट लगाने के प्रस्ताव मिले।
उनकी रणनीति सिर्फ उत्पादन बढ़ाने की नहीं थी। मलेशिया का ज्यादातर पाम ऑयल भारत आता था और थाईलैंड के कई उत्पाद भी भारत भेजे जाते थे। वहीं कंज्यूमर ब्रांड्स के बजाय उन्होंने औद्योगिक इंटरमीडिएट्स पर ज्यादा भरोसा किया विस्कोस, एक्रिलिक फाइबर, कार्बन ब्लैक, सिंथेटिक यार्न, पाम ऑयल, फैटी एसिड, डिटर्जेंट इंटरमीडिएट्स, एपॉक्सी रेजिन और हाइड्रोजन पेरोक्साइड जैसे उत्पादों पर।
आज दुनिया के 41 देशों में फैला है कारोबार
आदित्य बिड़ला ग्रुप आज भारत के प्रमुख कॉरपोरेट ग्रुप्स में गिना जाता है। दुनिया के 40 से ज्यादा देशों में कारोबार फैला है। इसका विस्तार मुख्य रूप से उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, यूरोप, एशिया और अफ्रीका में है। खास बात यह है कि ग्रुप के कुल राजस्व (लगभग $67 से $70 बिलियन) का 50% से अधिक हिस्सा विदेशी ऑपरेशंस यानी भारत के बाहर से आता है।
ग्रुप में 100 से अधिक देशों के लगभग 2.27 लाख से ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं। आदित्य बिड़ला ग्रुप मुख्य रूप से मेटल्स और माइनिंग, सीमेंट, पल्प, फाइबर और टेक्सटाइल्स, केमिकल्स एंड कार्बन ब्लैक, फैशन एंड रिटेल्स, टेलीकॉम, फाइनेंशियल सर्विसेज, पेंट्स और ज्वैलरी जैसे सेक्टर में काम करता है। साभार दैनिक जागरण
