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August 31, 2026

आखिर विदेशी फंडिंग बिल की आलोचना क्यों कर रहा है विपक्ष ? आप भी समझिए  

नई दिल्ली। मानसून सत्र का अंतिम सप्ताह शुरू होने वाला है। ऐसे में केंद्र सरकार पूरी कोशिश में है कि फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट ( एफसीआरए ) बिल संसद से पास हो जाए। इस बिल पर चर्चा के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सदन में मौजूद रह सकते हैं। लेकिन विपक्ष ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है कि कांग्रेस, विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक का विरोध करेगी और सोमवार को विपक्षी दलों के फ्लोर नेताओं की बैठक में भी इस मुद्दे पर चर्चा की जाएगी।

एफसीआरए बिल क्या है?
एफसीआरए बिल यानी विदेशी अंशदान संशोधन विधेयक, भारत में विदेशों से मिलने वाले चंदे या आर्थिक सहायता को नियंत्रण और पारदर्शी बनाने वाला एक बहुत जरूरी कानून है। मूल एफसीआरए कानून साल 1976 में उस समय की कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया था, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि विदेशी धन से देश के आंतरिक मामलों या संस्थाओं पर कोई गलत प्रभाव न पड़े।

बिल में कौन सा संशोधन किया जा रहा है?
इस बार के एफसीआरए बिल में एक ‘तय अथॉरिटी बनाने का प्रस्ताव है। अगर किसी संस्था का एफसीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाता है, सरेंडर कर दिया जाता है या उसकी समय-सीमा खत्म हो जाती है, तो यह अथॉरिटी विदेशी चंदे का कंट्रोल अपने हाथ में ले लेगी। ऐसे विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियां शुरू में ‘तय अथॉरिटी’ के कंट्रोल में रहेंगी।

अगर इसके बाद भी संस्था तय समय के अंदर अपना रजिस्ट्रेशन दोबारा हासिल नहीं कर पाती है तो बाद में इन संपत्तियों को पूरी तरह से ट्रांसफर किया जा सकता है। जरूरत पड़ने पर, अथॉरिटी के पास संपत्तियों को मैनेज करने और ऐसी संस्थाओं की गतिविधियों पर नज़र रखने का अधिकार भी होगा।

 तीन सेक्शन पर विवाद बना
एफसीआरए बिल के तीन सेक्शन पर विवाद बना हुआ है। इनमें सेक्शन 14B, सेक्शन 16A और सेक्शन 16B शामिल हैं। सेक्शन 14B, जो FCRA सर्टिफिकेट के खत्म होने की बात करता है, उसमें कहा गया है कि अगर कोई संस्था रिन्यूअल के लिए अप्लाई नहीं करती है, उसका रिन्यूअल नामंजूर हो जाता है या रिन्यू हुए बिना ही सर्टिफिकेट की मियाद खत्म हो जाती है, तो सर्टिफिकेट को खत्म माना जाएगा।
सेक्शन 16A में प्रस्ताव है कि जिस संस्था का सर्टिफिकेशन खत्म हो गया है, उसे मिले विदेशी फंड और उसकी संपत्तियां एक ‘निर्धारित अथॉरिटी’ के अधिकार में आ जाएंगी। यानी इस तरह की संपत्ति पर निर्धारित अथॉरिटी का कंट्रोल हो जाएगा।
विवाद का तीसरा मुद्दा सेक्शन 16B है, जो पुराने कानून के तहत पहले से ही किसी अथॉरिटी के अधिकार में आ चुकी संपत्तियों पर नए नियम लागू करने की इजाजत देगा, इससे उन संस्थाओं पर बुरा असर पड़ने का डर है जिनका एफसीआरए रजिस्ट्रेशन सालों पहले खत्म हो गया था, लेकिन वे अब घरेलू फंड से काम कर रही हैं।

विपक्ष की पीड़ा क्‍या है ?
कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल के मुताबिक एफसीआरए बिल ‘पूरी तरह से असंवैधानिक’ है और उन्होंने आशंका जताई कि इस नए कानून से NGO और कम्युनिटी ग्रुप्स, खासकर अल्पसंख्यकों द्वारा चलाए जा रहे संगठनों को नुकसान हो सकता है। उन्होंने इसे संगठनों, खासकर केरल में ईसाई समूहों को डराने और उन पर नियंत्रण करने की जानबूझकर की गई कोशिश बताया। उन्होंने कहा कि यह बिल स्वैच्छिक और सामाजिक सेवा संगठनों पर शिकंजा कसेगा। वहीं, तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने इस बिल के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा। जिसमें उन्होंने कहा कि प्रस्तावित कानून से शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्रों में काम करने वाले NGO और अन्य संगठनों पर कार्यपालिका का अत्यधिक नियंत्रण हो सकता है।
वहीं, DMK अध्यक्ष एम.के. स्टालिन ने केंद्र से एफसीआरए संशोधन बिल वापस लेने और विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 की धारा 15 को रद्द करने की मांग की है। BURXकेरल में, कैथोलिक चर्च ने भी मौजूदा FCRA कानून में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर चिंता जताई है। साभार नवभारत